ठाकुर प्यारे लाल सिंह के व्यक्तित्व का समग्र अध्ययन
डा गणेश खरे के ऐतिहासिक उपन्यास क्रांतिदूत के विशेष सन्दर्भ में
चुन्नी लाल साहू
सहा. प्रा. एवं शोधार्थी, शा.वि.या.ता., स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, दुर्ग (छ.ग.)
तुम्हारे जीवन का उद्देश्य
क्रान्ति !
क्रान्ति का अर्थ भी जानते हो
अंग्रेजों की गुलामी और जमीदारों, सामंतों तथा राजा-महाराजाओं के शोषण से मुक्ति के लिए आन्दोलन।‘‘
क्या यह संभव है
असंभव कुछ भी नहीं होता।
बेटे! लगता है तुम गुमराह हो रहे हो। पढ़ते लिखने में अच्छे हो, खेलने में कहना ही क्या ? शाला के नायक भी हो और तुम्हारे विचार इतने दूषित ? मैं आज ही तुम्हारे पिताजी से कहूंगा कि तुम्हारी संगति बिगड़ रही है। हेडमास्टर संता राम ने कहा।
‘‘कोई लाभ नहीं होगा गुरूजी। मेरे पिताजी अच्छी तरह जानते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य क्या होना चाहिए, क्योंकि वे स्वयं शिक्षा-विभाग में कार्य करते हैं। ‘‘1प्यारे लाल ने उत्तर दिया। डाॅ.खरे रचित उपन्यास ‘क्रांतिदूत ‘ का यह अंश ठाकुर प्यारे लाल सिंह के व्यक्तित्व को बखूबी प्रदर्शित करता है। 15-16 वर्ष की कच्ची उम्र से ही क्रांति, शिक्षा, समाज और देश के बारे में सोचने वाले ठाकुर प्यारे लाल सिंह सचमुच एक ‘क्रांतिदूत‘ बनकर हमारे समाज और देश में क्रांति का अलख जगाते हैं।
ठाकुर प्यारे लाल सिंह का जन्म 21 दिसंबर 1891 को राजनांदगांव के दैहान गाॅव के ठाकुर दीन दयाल सिंह के घर हुआ था। दीनदयाल जी सम्पन्न और पढ़े-लिखे थे। वे शिक्षा विभाग में एक अधिकारी थे। ठाकुर प्यारे लाल सिंह की माता जी का नाम श्रीमती नर्मदा देवी था।
ठाकुर प्यारे लाल सिंह को रमेश नैयर ने ‘त्याग मूर्ति ‘कहा तो डाॅ. खरे ने ‘क्रांतिदूत ‘। उनके वास्तविक एवं समग्र व्यक्तित्व को निम्न बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है-
क्रांतिकारी
डाॅ. खरे ने तो इस पर उपन्यास का नाम ही ‘क्रांतिदूत ‘ रखा है। उनके इस उपन्यास में इसका दर्शन सर्वत्र होता है। हेडमास्टर संताराम के पूछने पर किशोर ठाकुर प्यारे लाल का जवाब - ‘‘ तुम्हारे जीवन का उद्देश्य ?‘‘
‘‘ क्रांति !‘‘ प्यारे लाल का जवाब।2
आन्दोलन विषय पर बात करते हुए करमू को ठाकुर प्यारे लाल कहते हैं -
‘‘ करमू ! गांधी जी कहते हैं कि अंग्रेज हमारे देश की स्वतंत्रता हमें एक दिन थाली में सजा कर उपहार की तरह सौंप देंगे। तुम क्या सोचते हो ? क्या हम अंग्रेजों पर विश्वास कर सकते हैं ? मेरा मन बार-बार कहता है - नहीं, नहीं !‘‘3
एक रात्रि गोल चैक में विराट जनसभा को सम्बोधित करते हुए ठाकुर प्यारे लाल कहते हैं - ‘‘ मैं आपके बीच रहूॅ या न रहूॅ पर क्रांति की यह ज्योति , अंग्रेजी दमन के वात्याचक्र में न बुझे , मेरा यही निवेदन है।‘‘4
साहसी
ठाकुर प्यारे लाल सिंह किशोरावस्था से ही साहसी थे वे अपने अधिकार और अपनी बात बिना किसी से डरे रखते थे। संदर्भित उपन्यास में हेडमास्टर संतराम और ठाकुर प्यारे लाल संवाद द्रष्टव्य हैं -
‘‘रूको , इस तरह भागने से समस्याएॅ हल नहीं होंगी। सुना है तुम अब दीवान के विरूद्ध भी लोगों को भड़का रहे हो ?‘‘ -
‘‘सही-सही बातें कहने का मतलब क्या भड़काना होता है ?‘‘
‘‘ पर इसका परिणाम जानते हो ?‘‘
‘‘ सत्य की सदा विजय होती है , मास्टर साहब !‘‘ प्यारे लाल ने विश्वासपूर्वक कहा।
‘‘ मेरे बेटे ! यह रास्ता बहुत खतरनाक है। इसमें जगह-जगह गहरी-गहरी खाइयाॅ हैं और...‘‘
दीवान साहब मुझे अपनी ताकत से कभी भी और किसी भी खाई में फिंकवा सकते हैं ? यही न ?‘‘ ठाकुर प्यारे लाल ने कहा।5
इस प्रकार ठाकुर साहब की निर्भिकता के दर्शन उपन्यास के हर घटनाक्रम में होते हैं।
कुशल नेतृत्व
छत्तीसगढ़ में अनेक आन्दोलन हुए यथा- मजदूर आन्दोलन, स्वतंत्रता आन्दोलन, सहकारी आन्दोलन। सभी में ठाकुर साहब का कुशल नेतृत्व प्राप्त हुआ जिस कारण से आन्दोलन सफल भी रहे।
सब को साथ लेकर चलने वाले
ठाकुर प्यारे लाल ने जितने भी आन्दोलनों में नेतृत्व किया जनता के हर वर्ग को साथ लेकर चले। समाज में किसी भी वर्ग के प्रति भेद-भाव की भावना नहीं रखी। संदर्भित उपन्यास में रियासत के दीवान और ठाकुर साहब के बात-चित का अंश द्रष्टव्य है -
‘‘ प्यारे लाल ! तुम अभी बच्चे हो। न राजनीति समझते हो और न ही राजतंत्र का कोप तुमने देखा है। ..........................
क्या तुम चाहते हो कि तुम्हारी मुर्खताओं से उनकी नौकरी खतरे में पड़ जाये ?‘‘
‘‘नौकरी का यह खतरा तो सदा बना रहेगा आने वाली भी पीढ़ियाॅ भी इस अभिशाप को भोगती रहेंगी। इससे बेहतर है कि हम खुद इस निर्णायक युद्ध को निपटा दें।‘‘
क्या इसका अर्थ है कि तुम अकेले ही इस युद्ध को निपटा लोगे ?‘‘
‘‘हर अच्छे कार्य में जनता का सहयोग मिलता है।‘‘ प्यारे लाल ने कहा।6
अहिंसावादी
ठाकुर प्यारे लाल गांधी जी के अनयन्य ंभक्त थे। वे एक पक्के गांधी वादी थे। गांधी जी के सत्य और अहिंसा के समर्थक। संदर्भित उपन्यास में ठाकुर प्यारे लाल ने करमू नामक बुरे पात्र का हृदय परिवर्तन कर उसे मजदूर व समाज हित में कार्य करने के लिए प्रेरित किया। जब करमू ने कहा - ‘‘यह कार्य हम आज से ही प्रारंभ कर देंगे वकील साहब ! जो भाई बातों से नहीं मानेंगे , उन्हें हम लातों से मना लेंगे।‘‘
ठाकुर प्यारे लाल ने करमू से कहा - ‘‘ नहीं हृदय परिवर्तन ही अधिक स्थायी और विश्वसनीय होता है। हिंसा और द्वेष, घृणा तथा बदले की भावना को जन्म देता है तथा अहिंसा क्षमा, प्रेम और सहयोग को । हमारा रास्ता गांधी वादी है।‘‘7
स्वाभीमानी
ठाकुर साहब स्वाभीमानी प्रवृत्ति के थे। जब तत्कालिक शासन ने वकीलों की सनद छीनी तो कईयों ने शासन से सनद मांगकर फिर से वकालत शुरू करने लगे लेकिन ठाकुर प्यारे लाल ने फिर आजीवन वकालत नहीं की। संदर्भित उपन्यास का यह अंश द्रष्टव्य है -
रूईकर साहब ने जब प्यारे लाल से मजदूरों के लिए लड़ने हेतु अपनी वकालत की सनद वापस मांगने के लिए कहा तो ठाकुर साहब ने उत्तर दिया - ‘‘ मैं क्यों मांगू , जिसने छीनी है , वही दे। फिर सनद कोई स्वर्ग का तोहफा तो नहीं है ?‘‘8
स्पष्टवक्ता
ठाकुर साहब स्वाभीमानी, प्रखर वक्ता के साथ स्पष्ट वक्ता थे। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के एक प्रांतिय अधिवेशन में ठाकुर प्यारे लाल ने कांग्रेसियों की खुलकर आलोचना करते हुए कहा कि ‘‘ मुझे इस बात का संदेह ही नहीं पूरा विश्वास था कि स्वतंत्रता के बाद इस देश में अधिकारों तथा सत्ता के दुरूपयोग का एक काला युग प्रारंभ हो कर रहेगा। अब कांग्रेसियों की कथनी और करनी में इतना अधिक अंतर आ गया है। सिद्धान्तों की रक्षा करने के स्थान पर अब सर्वत्र स्वार्थ की रक्षा की जा रही है। .............. मैं यह बात बार-बार कह रहा हूॅ कि कांग्रेस मेन अपना आचरण सुधारो ................।‘‘
इस पर सभा के अध्यक्ष ने टिप्पणी की - ‘‘ कांग्रेस किसी की बपौती नहीं है।‘‘
ठाकुर साहब ने सहज स्वर में कहा -‘‘ महंत लक्ष्मी नारायण दास ! मैं आज तक कांग्रेस को अपने बाप की समझता था। पर यदि तुम कहते हो कि वह तुम्हारे बाप की है तो लो अपनी कांग्रेस मैं चला। ‘‘9
ईश्वर पर आस्था
ठाकुर साहब नियमित रूप से गीता का पाठ करते थे। उन्हें ईश्वर पर विश्वास था। ठाकुर साहब का मानना था कि हर इन्सान के हृदय में ईश्वर का वास होता है। हमारे जीवन के सारे कार्य ईश्वर की प्रेरणा से ही सम्पन्न होते है। उपन्यास का प्रस्तुत अंश द्रष्टव्य है। प्यारे लाल ने रामकृष्ण के पत्र के उत्तर में लिखा -
‘‘ प्रिय बाबू !
तुम स्वयं को ईश्वर के निमित रूप में समझो। घर के विषय में या किसी के विषय में कभी चिन्ता मत करो। हम सबके हृदय में अन्तर्यामी ईश्वर निवास करते हैं। हमारे जीवन के सारे कार्य उन्हीं के प्रेरणा से संचालित हो रहे हैं ................।‘‘10
डाॅ. खरे ने संदर्भित उपन्यास सवतंत्रता प्राप्ति की रात्रि के वातावरण का वर्णन करते हुए लिखा है - ‘‘उस रात भर गोल चैक में हजारों लोग इकट्ठे रहे , राष्ट्रीय गीत, भजन और भाषण होते रहे। ठीक बारह बजे जब दिल्ली में पं. नेहरू ने स्वतंत्रता प्राप्ति की घोषणा की , तब सारा जन-मानस हर्ष के पारावार में डूब गया। इधर ठाकुर साहब एक सामान्य से कमरे में एकान्त में बैठे हुए ध्यान में लीन थे। वे योग और क्षेम के रक्षक श्रीकृष्ण को धन्यवाद दे रहे थे जिनके नेतृत्व में असत्य पर सत्य , अधर्म पर धर्म और अंधकार पर ज्योति की विजय का सूचक यह महाभारत आज पूरा हो रहा था।‘‘11
मातृ भूमि, जन्मभूमि के लिए प्यार
ठाकुर प्यारे लाल को अपने जन्मभूमि राजनांदगांव से बेहद लगाव था। मजदूर आन्दोलन के दौरान उन्हें कई बार अपने जन्मभूमि से बाहर रहना पड़ा फिर भी उन्हें राजनांदगांव से बहुत प्यार था। संदर्भित उपन्यास के ये अंश द्रष्टव्य हैं - ‘‘ मैं तुम्हें ही पुकार रहा था। इधर आओ, सुनो ! कुछ समझ में नहीं आता, अब किस तरफ चला जाये। रियासत का आदेश है कि आज शाम इस राज्य की सीमा छोड़ दी जाये।‘‘ प्यारे लाल ने अपनी पत्नी से कहा।
‘‘ सुना तो मैने भी है।‘‘
‘‘ तुम्हें अपनी मातृभूमि छोड़ने में दुख नहीं होगा ?‘‘
‘‘ कैसा दुख ? फिर हम छोड़ कहाॅ रहें हैं , सिर्फ कुछ समय के लिए बाहर जा रहे हैं। स्थितियाॅ बदलेंगी, तो फिर आ जायेंगे।‘‘
‘‘ काश, यह सच होता गोमती ! नांदगांव की यह बलिदानी माटी, रानी सागर का यह निर्मल जल, मित्रों का भरा पूरा परिवार, मजदूर भाई-बहनें !
क्या मैं इनके बिना जिन्दा रह सकंूगा ?‘‘12
14 अगस्त 1947 की शाम को ही ठाकुर प्यारे लाल सिंह नागपुर से नांदगांव आ रहे थे। रेल के डिब्बे में उनके साथ महंत लक्ष्मी नारायण दास तथा पं. रविशंकर शुक्ल भी थे। सभी ने उन्हें मनाया, कि स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आपको रायपुर चलना चाहिए। सारा रायपुर आपके स्वागत के लिए प्रतिक्षा कर रहा है, आप नांदगांव क्यों उतर रहे हैं ? जवाब में ठाकुर प्यारे लाल ने कहा - ‘‘शुक्ल जी ! रायपुर मेरा कर्म क्षेत्र है, पर नांदगांव तो मातृभूमि है। मेरी दृष्टि से स्वतंत्रता के अवसर पर हर व्यक्ति को अपनी मातृभूमि में ही होना चाहिए।‘‘13
त्यागमूर्ति
ठाकुर साहब त्याग के मूर्ति थे। इतने नामी वकील, मजदूर आन्दोलनों के नेता रहते हुए भी उन्होंने अपने लिए किसी प्रकार की कोई सम्पत्ति इकट्ठा नहीं की । लक्ष्मी नारायण के शब्दों में -‘‘ इतना सब होते हुए भी रायपुर में उनकी अपनी एक झोपड़ी भी नहीं। यह कम आश्चर्य का विषय है ? छत्तीसगढ़ को गांधी, दीनबन्धु, गरीबों का सहारा, त्यागमूर्ति ऐसे ही महापुरूषों को कहा गया है।‘‘14
‘ छत्तीसगढ़ के नवरत्न ‘ के लेखक रमेश नैयर ने ठाकुर साहब के लिए ‘ त्यागमूर्ति ठाकुर प्यारे लाल सिंह ‘15 नाम से एक अध्याय ही लिखा है।
‘‘ ठाकुर साहब देश और समाज के लिए अपना सब कुछ त्याग देने वाले तपस्वी थे।‘‘16
स्पष्ट है ठाकुर प्यारे लाल सिंह एक विराट व्यक्तित्व के मालिक थे। ठाकुर साहब क्रांतिकारी, निर्भिक, स्वतंत्रता प्रिय, आत्मविश्वासी, हाजिरजवाबी, कुशल जन नेता, गरीबों का मसिहा, सब को साथ लेकर चलने वाले, अन्याय और अत्याचार का विरोध करने वाले महान मजदूर नेता थे। संदर्भित उपन्यास में पोलिटिकल एजेंट प्यारे लाल के बारे में कहते हैं-
‘‘तुम लोग खुद प्रशासन का ए.बी.सी. नहीं जानते। इट इज यूजलेस टू से ही इज ट्रेटर। ही इज जाइन्ट, ही इज ए राक।ं मानता हूॅ कि खेल के मैदान में उसकी कोई टक्कर नहीं। उसके हाथ में गेंद लगी तो मतलब गोल हो गया। पर इसका यह अर्थ तो नहीं है कि वह आदमी नहीं है। कमजोरियाॅ तुम सबके भीतर हैं। है तुम लोगों में उसके समान ईमानदारी, साहस , क्रियाशीलता तत्काल निर्णय लेने की क्षमता ? ही इज ए रीजनेबिल मैन, ही इज फस्ट क्लास लाइयर। उसकी तर्क-शैली सुनकर कोई भी मुग्ध हो जायेगा। ही इज फार कामन मैन, ही इज मेड फार कामन मैन।‘‘17
संदर्भ ग्रंथ सूची
1. खरे, डाॅ. गणेशः क्रांतिदूत: शांतिप्रकाशन, इलाहाबाद, 1984, पृ. 9
2. वही, पृ. 9
3. वही, पृ. 88
4. वही, पृ. 145
5. वही, पृ. 11
6. वही, पृ. 40 व 41
7. वही, पृ. 62
8. वही, पृ. 111
9. वही, पृ. 152
10. वही, पृ. 143
11. वही, पृ. 149
12. वही, पृ. 102
13. वही, पृ. 146
14. वही, पृ. 148
15. नैय्यर, रमेश: छत्तीसगढ़ के नवरत्न: शताक्षी प्रकाशन, रायपुर, पृ. 25
16. वही, पृ. 34
17. खरे, डाॅ. गणेशः क्रांतिदूत: शांतिप्रकाशन, इलाहाबाद, 1984, पृ. 57
Received on 01.12.2016 Modified on 19.12.2016
Accepted on 26.12.2016 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 4(4): Oct.- Dec., 2016; Page 218-221